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रविवार, 29 मई 2011

इन्टरनेट

रेल की सीटी सुन कर नींद में भी मुस्कुरा उठने वाले मार्क्स
न जाने कितने खुश हुए होते
एंगेल्स से चैटिंग कर के
‘न्यूयार्क डेली ट्रीब्यून’ के संपादक को ईमेल पर लेख भेज कर
‘पूंजी’ के बिखरे पन्नों को हार्ड डिस्क में समेट कर
फेसबुक पर प्रथम इंटरनेशनल का ग्रूप बनाकर.

मैं नहीं जानता वह अकेला इंजीनियर था
या इंजीनियरों की कोई टोली थी
जिसने रचा था इन्टरनेट के सॉफ्टवेयर का महाकाव्य
मैंने सुना है कि इन्टरनेट का ईजाद तब हुआ
जब पेंटागन को जरूरत पड़ी थी
अपने कंप्यूटरों को आपस में जोड़ने की .

क्या पेंटागन ने कभी सोचा था?
इन्टरनेट निकल जाएगा
उसकी लौह दीवारों को ध्वस्त कर
फैल जाएगा पूरी दुनिया में
वर्ल्ड वाइड वेब बन कर
और एक दिन बरसेगा उसके ऊपर बम बनकर .

मैं सलाम करता हूं
उस अचेतन क्रांतिकारी को
जिसने रचा इन्टरनेट
मेरा वस चले तो
दुनिया भर के बच्चों की किताबों में
उसकी जीवनी लगा दूं .

मैं सलाम करता हूं
मुनाफाखोर बिल गेट्स को भी
आखिर उसके कंप्यूटरों के बिना
काम नहीं कर सकता था इन्टरनेट.

वसुधैव कुटुम्बकम,
विश्व मानवता की ओर,
दुनिया के मजदूरों एक हो,
सब ही तो खड़े थे स्टॉप पर,
न जाने कब से,
इन्टरनेट का बस पकड़ने के लिए.

इंद्रप्रस्थ


यह है इंद्रप्रस्थ का इंद्रजाल 
इसमें भूखी-नंगी जनता सुनहरे सपने देखती है 
और महारानी के दर्शन भर से धन्य हो जाती है । 
ग़रीब जनता गौर से निहारती है महारानी को 
उनमें उसे सत्यहरिश्चंद्र की आत्मा नज़र आती है
उसे लगता है वे महारानी नहीं, सत्य हरिश्चंद्र की नया अवतार हैं

इंद्रप्रस्थ की रानी कहती है देश में भ्रष्टाचार बढ़ गया 
करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ी 
ग़रीबों की आबादी में भी इजाफ़ा हुआ 
रानी कहती है ग़रीबी और भ्रष्टाचार बेहद चिंता की बात 
जनता जवाब नहीं माँगती 
वह तो मंत्रमुग्ध है उनके सम्मोहन में

ऋषियों का यह देश चाणक्य का भी है
चंद्रगुप्त का भी 
सपने तो टूट ही रहे हैं
जिस दिन टूटेगा इंद्रजाल जनता पूछेगी
रानी जी! फिर कलमाड़ी को क्यों बचाया ?
और राजा को क्यों हटाया?
महारानी जी! थरूर पर हुई थू-थू 
फिर भी कम नही हुई मनमोहन की मुस्कान 
ये सब के सब तो आप के ही प्यादे हैं न 
राज आपका 
बिसात आपकी प्यादे आपके 
संविधान में सरकार भले ही चलती है संसद से 
हक़ीक़त यह है कि दस जनपथ की इच्छा के बिना 
सात रेस कोर्स का पत्ता तक नहीं हिलता 

रानी जी, पूरा देश जानता है 
आपकी मुस्कान से ही मुस्कुराते हैं करोड़पति-अरबपति
आपके चहकने से आमजन हो जाता है मायूस 
दरअसल सिर्फ़ कहने को जनपथ में रहती हैं आप 
भले ही इस देश में आपका अपना कोई घर-बार नहीं
हक़ीक़त में आप राजपथ की रानी हैं 
तौर-तरीके और रहन-सहन से तो यही लगता है
आप इंद्रप्रस्थ की महारानी हैं । 
 
समय आने दीजिए महारानी जी! 
भूखी-नंगी जनता करेगी आपकी करतूतों का पूरा हिसाब 
पूछेगी क्या हुआ अफ़ज़ल का, कहाँ है कसाब ?  
पूछेगी क्या संसद से भी बड़ा है होटल ताज ? 
महारानी जी यही है आपका राज ? 
 
ज़रूर टूटेगा एक दिन इंद्रजाल 
और भूखी-नंगी जनता को लगेगा 
आपमें नहीं बसती है सत्य हरिश्चंद्र की आत्मा ।

गुरुवार, 26 मई 2011

आत्म-कथा -- 'आत्म' की कथा

मैं आत्म हूं। समस्त भूतों (पदार्थों) - जड, जंगम, जीव में अवस्थित, उनका स्वयं, उनका अन्तर; "सर्व भूतेषु आत्माः"। भौतिक विग्यानी मुझे ’एटम’ या ’परमाणु’ कहते हैं-अन्तिम कण, अर्थात प्रत्येक वस्तु का वह लघुतम अंश जिससे वह बनी है। अध्यात्म, मुझे ’आत्म’ कहता है, प्रत्येक भूत में निहित। अतः मैं एटम का भी आत्म हूं। मेरे विना परमाणु भी क्रिया नहीं कर सकता। वह जड है, मैं चेतन; मैं आत्म हूं।
जब न ब्रह्मांड था,न परम व्योम,न वायु,नकाल,न ग्यान,न सत-न असत ; कुछ भी नहीं था। चारों ओर सिर्फ़ अंधकार व्याप्त था; केवल मैं चेतन ही अकेला, स्वयं की शक्ति से, गतिशून्य होकर स्थित था। कहां? क्यों? कैसे? कोई नहीं जानता; क्योंकि मैं ही सत हूं, मैं ही असत हूं, मैं ही सर्वत्र व्याप्त स्वयंभू व परिभू हूं; सब कुछ मुझ में ही व्याप्त है। मैं आत्म हूं।
मैं अपने परम अव्यक्त रूप -असद रूप या नासद रूप में जब आकार रहित होता हूं, ’पर-ब्रह्म’ कहलाता हूं। इस रूप में, मैं -कारणों का कारण, कारण ब्रह्म हूं,जो अगुण,अक्रिय,अकर्मा,अविनाशी, सबसे परे-परात्पर एवं केवल द्रिष्टा -सब द्रष्टियों की द्रष्टि- हूं। मेरे रूप को सिर्फ़ मनीषी ,आत्मानुभूति से ही जान पाते हैं और "वेद" रूप में गान करते हैं। मैं अक्रिय,असद चेतन सत्ता,स्वयंभू,परिभू हूं’; मैं आत्म हूं।
जब श्रष्टि हित मेरा भाव सन्कल्प ’ओ३म’रूप में आदि-नाद बनकर उभरता है तो मैं, अक्रिय-असद सत्ता से; सक्रिय-सत-चेतन सत्ताके रूप में व्यक्त होकर ’सद-ब्रह्म’, परमात्मा,ईश्वर, सगुण-ब्रह्म या हिरण्यगर्भ कहलाता हूं;जिसमें सब कुछ अन्तर्निहित है। मैं आत्म हूं।
हिरण्यगर्भ रूप में, जब मैं स्रष्टि को प्रकट करने की इच्छा करता हूं तो- "एकोहं बहुस्याम" की ईषत इच्छा, पुनः ’ओ३म’ रूप में प्रतिध्वनित होकर, मुझमें अन्तर्निहित अव्यक्त मूल-प्रक्रिति, आदि-ऊर्ज़ा को व्यक्त रूप में अवतरित कर देती है और वह ’माया’ या ’आदि-शक्ति’ के रूप में प्रकट व क्रियाशील होकर, जगत व प्रक्रति की रचना के लिये, ऊर्ज़ा तरंगों, विभिन्न कणों एवं भूतों की रचना करती है; और मैं प्रत्येक कण में उनका ’आत्म’ बनकर प्रवेश कर जाता हूं, जड, जन्गम, जीव, सभी में। मैं आत्म हूं।
जड रूप श्रष्टि में -भौतिक विग्यानी,मुझे केवल ’एटम’ या परमाणु तक ही पहचानते हैं, यद्यपि मैं परमाणु का भी चेतन-आत्म हूं। चेतन-रूप स्रष्टि में-मैं,जीव,जीवात्मा,आत्मा या चेतना के रूप में प्रवेश करता हूं,जिसे जीवन या जीवित-सत्ता कहा जाता है; प्राणधारी व प्राण भी। इस रूप में, मैं-माया के प्रभाव में विभिन्न अच्छे-बुरे सान्सारिक कर्मों में लिप्त होता हूं और जन्म-मरण के असन्ख्य चक्रों में घूमता हूं, सुख-दुख भोगता हूं, जब तक अलिप्त-अकाम्य कर्मों के कारण ’मोक्ष’ अर्थात माया बन्धन से छुटकारा न मिले। मैं आत्म हूं।
मैं जीव, जीवात्मा या प्राणी के रूप मेंजब अपने बहुत से सत्कर्मों का संचय कर लेता हूं तो प्रक्रति की सर्वश्रेष्ठ क्रति--जिसे ज्ञान, मन, बुद्धि व संस्कार उपहार में मिलते हैं--मानव, मेन या आदम, के रूप में जन्म धारण करता हूं। इस रूप में, मैं स्वयं को माया बंधन से मुक्त करके, "मोक्ष" प्राप्त करने का प्रयत्न करता हूं और स्वयं को सत-व्यक्त ब्रह्म, हिरण्यगर्भ में लीन कर देता हूं एवम ’परम-आत्म ’ कहलाता हूं। लय या प्रलय के समय मैं पुनः "अनेक से एक" होने की इच्छा करता हुआ, प्रक्रति व माया लीन हिरण्यगर्भ को स्वयं में लीन करके पुनः अक्रिय, असद, परमसत्ता- "पर-ब्रह्म" बनकर अव्यक्त बनजाता हूं। मैं आत्म हूं।

वैज्ञानिक परिकल्पनाएं

परिकल्पनाएं आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति का आधार हैं. आज का विज्ञान जिन सिद्धांतों पर टिका हुआ है वे सिद्धांत प्रारम्भ में परिकल्पनाओं के रूप में जन्मे थे.
जब उन परिकल्पनाओं को प्रयोगों और गणितीय रूप में परखा गया और उनकी सत्यता सिद्ध हुई तो वे सिद्धांत बने. प्रमुख परिकल्पनाएं और सिद्धांत जिन पर आधुनिक विज्ञानं की नींव टिकी है उनमें शामिल हैं हाइगेन्स की तरंग संचरण सम्बन्धी परिकल्पना, प्लैंक की प्रकाश फोटोन की परिकल्पना, आइन्स्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत, गुरुत्वीय बल के कारक ग्रैविटान की परिकल्पना, ब्लैक होल की परिकल्पना इत्यादि. इनमें से बहुतों को सिद्धांत के रूप में मान्यता मिल चुकी है और शेष की पुष्टि न होने के कारण मात्र परिकल्पना के रूप में लिया जाता है. आशा यह की जाती है कि भविष्य में इनकी सत्यता या असत्यता सिद्ध की जा सकेगी.

आधुनिक विज्ञान में अनगिनत प्रकार की परिकल्पनाएं होने के बावजूद ऐसे अनगिनत क्षेत्र हैं जहाँ की घटनाओं या संभावित घटनाओं के बारे में व्याख्या करने के लिए किसी प्रकार की कोई परिकल्पना नहीं की गई है. वे क्षेत्र अभी तक वैज्ञानिक प्रगति से अछूते हैं और विज्ञान को वहां प्रवेश करने के लिए कल्पना रुपी द्वार की सख्त आवश्यकता है. ऐसी ही कुछ परिकल्पनाएं यहाँ प्रस्तुत हैं :

पहली परिकल्पना समय (टाइम) के बारे में है. कुछ विज्ञान कथाओं में टाइम मशीन की संकल्पना मिलती है. जिसमें एक मशीन के सहारे कोई व्यक्ति भूत या भविष्य में पहुँच जाता है. वहां वह उन घटनाओं का अंग बन जाता है, जो उस समय घटित हो रही हैं. प्रश्न उठता है क्या इस तरह की मशीन बनाना संभव है? इसके लिए एक और प्रश्न पर विचार करना होगा. मान लिया कोई व्यक्ति भूतकाल में जाकर अपने दादा की हत्या कर देता है. स्पष्ट है की अब उसका पैदा होना भी असंभव है. लेकिन अगर वह पैदा नहीं होगा तो वर्तमान में उसका अस्तित्व भी नहीं रह जायेगा. यह विरोधाभास सिद्ध करता है की टाइम मशीन का बनना असंभव है. लेकिन अगर हम और गहराई से विचार करें? आइंस्टाइन के द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण के अनुसार पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है.(E=mc2) पदार्थ क्या है? स्पेस में पदार्थ वह आकृति है जो चार विमाओं द्वारा निर्धारित होती है. ये चार विमायें हैं, लम्बाई, चौडाई, गहराई और समय.

दूसरे शब्दों में यदि कोई वस्तु चार विमायें रखती है तो उसे ऊर्जा में बदला जा सकता है. अगर इस ऊर्जा में थोडी कमी करके या बढोत्तरी करके वापस पदार्थ में बदला जाए तो तो उत्पन्न पदार्थ का द्रव्यमान मूल पदार्थ से कम या ज़्यादा होगा. इसी दिशा में यदि विचारों को बढाया जाए तो टाइम मशीन का बनना संभव है. इसके लिए समय को ऊर्जा में बदल कर उस ऊर्जा में कमी या बढोत्तरी करनी होगी. और फ़िर उसे वापस समय में परिवर्तित करना पड़ेगा. उस वक्त वह समय भूत या भविष्य में परिवर्तित हो जायेगा. लेकिन समस्या यह है की कोई वस्तु तभी ऊर्जा में बदल सकती है जब उसमें चारों विमायें हों. जबकि समय मात्र एक विमा है. यहाँ पर यह निष्कर्ष निकल सकता है की समय को वास्तविक ऊर्जा में तो नहीं बदला जा सकता, हाँ काल्पनिक ऊर्जा में ज़रूर बदला जा सकता है. और इस तरह भूत या भविष्य में पहुँचा जा सकता है. लेकिन ठीक उसी प्रकार मानो वहां पहुँचने वाला व्यक्ति कोई सपना देख रहा हो. सपने में ही वह व्यक्ति भूत या भविष्य की घटनाएं देख पायेगा लेकिन उनमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर पायेगा. इस प्रकार उपरोक्त विरोधाभास दूर हो जाता है.
दूसरी परिकल्पना द्रव्यमान ऊर्जा सम्बन्ध के बारे में है. यह तो सर्वविदित है की द्रव्यमान को ऊर्जा में और ऊर्जा को द्रव्यमान में परिवर्तित किया जा सकता है. नाभिकीय अभिक्रियाएँ तथा गामा फोटोनों से एलेक्ट्रोन तथा पाजिट्रोन बनना इसके उदाहरण हैं. द्रव्यमान ऊर्जा सम्बन्ध में एक नियम कार्य करता है जिसे द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण के नाम से जाना जाता है. इस नियम के अनुसार ब्रह्माण्ड के समस्त द्रव्यमान तथा ऊर्जा का योग नियत है. दोनों एक दूसरे में परिवर्तित किए जा सकते हैं. लेकिन उनका कुल योग सदेव एक नियतांक होगा. प्रश्न उठता है कि इस नियतांक का मान क्या होगा? उदाहरण के लिए किसी रासायनिक अभिक्रिया में यदि २ ग्राम तथा ३ ग्राम के दो अभिकारक लिए जाएँ तो अभिक्रिया के बाद बने कुल उत्पादों का द्रव्यमान ५ ग्राम होगा. यहाँ पर नियतांक का मान ५ ग्राम है. इसी प्रकार ब्रह्माण्ड के समस्त द्रव्यमान तथा ऊर्जा के योग के नियतांक का मान भी निश्चित संख्या होना चाहिए. इस बारे में मेरी परिकल्पना है कि इस नियतांक का मान शून्य होगा. कैसे? इसके लिए पहले कुछ छोटे निकायों (सिस्टम्स) को देखना होगा. किसी उदासीन परमाणु में कुल आवेशों का मान शून्य होता है. न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार किसी वस्तु पर बल लगाने पर उतना ही बल विपरीत दिशा में उत्पन्न हो जाता है. अर्थात बल का योग भी शून्य होता है. इस प्रकार विभिन्न निकायों का अध्ययन करने पर अधिकतर भौतिक राशियों का कुल मान शून्य ही आता है. अतः अगर ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े निकाय की बात करें तो इसमें द्रव्यमान - ऊर्जा का योग शून्य ही आना चाहिए. ऐसा इसलिए भी संभव है कि द्रव्यमान और ऊर्जा अलग अलग भौतिक राशियाँ हैं. इसलिए इनका कुल योग तभी संभव है जबकि इस योग का मान इकाई रहित हो जाए. और केवल शून्य संख्या इस कसौटी पर खरी उतरती है.
और अब आते हैं तीसरी परिकल्पना पर जो एंटी मैटर अर्थात प्रति पदार्थ से सम्बंधित हैं. प्रति कणों की खोज बहुत पहले ही हो चुकी है. और अब तक पाजिट्रान, एंटी प्रोटोन जैसे अनेक प्रतिकण खोजे जा चुके हैं. प्रकृति के प्रत्येक मूल कण का एक प्रतिकण अवश्य है. जो संपर्क में आने पर एक दूसरे को नष्ट कर डालते हैं. अगर मूल कणों का प्रति कण अस्तित्वा में है तो प्रति परमाणु, प्रति अणु और फिर प्रति पदार्थ (एंटी मैटर) भी अस्तित्व में होना चाहिये. लेकिन हम अभी तक कहीं भी प्रति पदार्थ के दर्शन नहीं कर सके हैं. क्यों? इसलिए क्योंकि ब्रह्माण्ड में समस्त स्थानों पर पदार्थ का फैलाव है. अगर इस बीच में कोई प्रति पदार्थ अस्तित्व में आएगा तो पदार्थ से टकराकर नष्ट हो जायेगा. इसलिए कोई ऐसा अलग दायेरा होना चाहिये जहाँ केवल प्रति पदार्थ हो, पदार्थ न हो. प्रश्न उठता है वह दायेरा, वह क्षेत्र कहाँ हो सकता है जहाँ प्रति पदार्थ यानी एंटी मैटर हो लेकिन पदार्थ (मैटर) न हो? स्पष्ट है की वह क्षेत्र एक ऐसा पूरक क्षेत्र (complementary Area) होगा जो हमारे इस अन्तरिक्ष से पूरी तरह अलग होगा. अब अन्तरिक्ष क्या है? चार विमाओं लम्बाई, चौडाई, और समय से निरूपित बिन्दुओं का समूह. इन्हीं बिन्दुओं द्बारा हम किसी पदार्थ और उसकी स्थिति को दर्शाते हैं. यहाँ पर हमें निर्देशांक ज्यामिति द्बारा लम्बाई, चौडाई और ऊंचाई तीनों के दो भाग मिलते हैं. धनात्मक (Positive) और ऋणात्मक (Negative) भाग. लेकिन आश्चर्य की बात है की समय का कोई नेगेटिव नहीं मिलता. तो क्या वास्तव में निगेटिव टाइम का कोई अस्तित्व नहीं है? लेकिन यह कैसे संभव है? जबकि ब्रह्माण्ड में हर चीज़ का एक ऋणात्मक भाग अस्तित्व में है. स्पष्ट है की ब्रह्माण्ड में एक ऐसा क्षेत्र हो सकता है जहाँ निगेटिव टाइम अस्तित्व में है. अगर ऐसा क्षेत्र है तो वह इस प्रकार का पूरक क्षेत्र होगा जहाँ तक हमारी या किसी अन्य पदार्थ की पहुँच असंभव होगी. तो फिर वहां क्या होगा? क्या प्रति पदार्थ वहीँ होगा? अगर ऐसा संभव है तो हमारे इस प्रश्न का जवाब मिल गया कि ब्रह्माण्ड में प्रति पदार्थ मौजूद है. जो एक अलग ही क्षेत्र में है. और वहां का समय हमारे समय का ऋणात्मक है. इस कारण इन दो क्षेत्रों का मिलना असंभव है. और इस तरह पदार्थ तथा प्रति पदार्थ अपना अलग अलग अस्तित्व रखते हैं.
ये थीं कुछ वैज्ञानिक परिकल्पनाएं जो यदि सत्य सिद्ध हो जाएँ तो भौतिक विज्ञान की दुनिया को नई दिशाएँ दे सकती हैं.
आभारः हिन्दी साइंस फिक्शन

एक चिड़िया

क्या कोई चिड़िया
उड़ सकती है
अपने टूटे हुए डैनों के साथ
लहुलुहान, नुचे पंखो के साथ।
जरा सोचो,
उस चिड़िया ने चाहा ही क्या था ..............?
एक छोटा सा घोंसला, चिड़वा और चूजों का सुख।
कभी-कभार खुले आकाष मं 
दूर तक उड़ने की चाह।
भोजन के तलाष में जाते हुए
नहीं होती थी बन्दिशें।
पर.....
अपने पहचान पर थी रोक और बंदिरो।
लगातार कर्तव्यों की फेहरिस्त पूरी करते-करते कहाँ रह गयी थी, वह पूरी चिड़िया।

कभी-कभी एक चिड़िया
छू लेती है पूरा आकाष
पहुंच जाती है सूरज के पास
यह जानते हुए कि झुलस सकते हैं उसके पर।
पर...

कभी-कभी नहीं फैला पाती
एक चिड़िया अपने पर
नहीं ताक पाती, खुले आसमान को जी भर।
नहीं चुन पाती, भूख से आकुल होकर
अपने और चूजों के लिए भोजन।
वह मजबूर है खुद को, चूजों को भूख से तड़पते रहने के लिए।
सोचो....
क्या... ?
तुम चिड़िया बनना चाहोगी।

बेशर्म लड़की

तितली के पंखों से,
गुलाब की पंखुड़ियों,
मोरपंखी के सूखे पत्तों से
किताब सजाती है,
वह एक लड़की।
पर इसे पढ़ नहीं पायेगी वह।
उसे तो पढ़ना है
घर-आंगन, चूल्हे की राख,
बच्चों का गू-मूत,
पति का पौरुष (अत्याचार),
बताती है मां,
अपने अब तक के अनुभव से।
फिर भी नहीं छोड़ती
किताबों में छिपाना, रंगीन पत्तियां,
मन में उड़़ाना, रंगीन तितलियां,
सपने सजाना,
बेशर्म लड़की।
देखती है सपने
सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार के।
सोती रहती है
बियावान में बने,
अपने सपनों के महल में,
अकेले सदियों तक,
सोती सुन्दरी के सपने के साथ।
तब भी,
जब कराहती है
एक डिब्बा किरासिन
एक माचिस की तीली के डर से।
जली आत्मा, जला तन लेकर,
अपनों को छोड़ कर,
सपनों को तोड़ कर,
सदियों की नींद से
जाग नहीं पाती है,
बेशर्म लड़की।
खड़़ीं हैं चौराहों पर,
जांघों के बीच खुजातीं
बेशर्म आंखें,
बजातीं सीटियां, कसती फब्तियां।
नजरें झुकाकर ,
थोडा सटपटाकर,
स्कूल जाना क्यों,
पढ़ना-पढ़ाना क्यों,
छोड़ नहीं पाती है
बेशर्म लड़की।
आई जो गर्भ में,
खडे़ हो गये कितने सवाल।
क्या है, लड़का या लड़की?
लड़की ?
गर्भ रखना है क्या ?
जन्मने से पहले ही
चिमटियों से खींचकर नोंच ली जाती है,
बोटी-बोटी कर दिया जाता है शरीर।
खुश होती है मां,
अब नाराज नहीं होंगे ‘वे’
खुश होता है ‘बाप’
एक मुसीबत तो टली।
फिर उसी गर्भ में,
हत्यारी दुनियां में,
बार-बार आना क्यों
छोड़ नहीं पाती है
बेशर्म लड़की।

खूबसूरत लड़कियां

खूबसूरत लड़कियां
नहीं मिलतीं आसानी से
होती हैं कई प्रतियोगिताएं
मिस सिटी से मिस यूनिवर्स तक
अब मिसेज भी होने लगी हैं
इसके बावजूद नहीं मिलतीं
उनके चेहरे पर लिपे होते हैं
प्रायोजकों के लेप
हर अंग पर लिपटी होती हैं
आयोजकों की चिंदियां
फिर भी नहीं होतीं वे खूबसूरत
उनके चेहरे पर चमकता है बाजार
अंतत: खारिज हो जाती हैं अगले साल
खूबसूरत लड़कियां नहीं मिलती प्रतियोगिताओं से
खूबसूरत लड़कियां जूझती हैं जीवन से
उनके चेहरे पर चमकती हैं पसीने की बूंदें
उनके दिल में होती है निश्‍‍छलता
नहीं जानतीं वे बाजार भाव
वे बिकाऊ नहीं होतीं