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गुरुवार, 16 जून 2011

कहीं खो गया है बचपन


बचपन की तलाश है
कहीं खो गया है बचपन
गलियों में रो रहा है बचपन

होटलों में ढाबों में धो रहा है बरतन
काँच की चूड़ियों में पिरो रहा है शबनम
बीड़ियों में तंबाखू समो रहा है बचपन

गोदियों में बचपन खिला रहा है बचपन
योजनाएँ सारी ध्वस्त है
कहीं भी खिलखिलाता नज़र नहीं
आ रहा है बचपन
.................कहीं खो गया है बचपन


................यशपाल सिंह

सबको तलाश


गुलाब बनने को तैयार हैं सब
बरगद कौन बनना चाहता है

गुंबद बनने को तैयार हैं सब
नींव की ईंट कौन बनना चाहता है
त्याग कौन करना चाहता है
वाह-वाही पाना चाहते हैं सब

पता है सबको जो बन जायेगा बरगद
वह हिल न सकेगा अपनी जगह से

पता है सबको जो बनेगा नींव की ईंट
सब बढ़ जाएँगे उस पर चढ़ के

पता है सब को जो करेगा त्याग
स्वार्थ पूरे करेगे सब उससे

पर बूढ़ा बरगद फिर भी
सबको शीतल छाँव प्रदान करता है
खुदी हुई नींव की ईंट भी

भटकों को सही रास्ता दिखाती है
त्यागियों का त्याग ही ज्ञान रूपी प्रकाश से

जीवन रूपी नर्क को स्वर्ग बना देता है
इसीलिए आज भी है तलाश सबको

बूढ़े बरगद की छाँव की
पक्की नींव की ईंट की

त्याग में ज्ञान के प्रकाश की
ओर प्यार की 

आया बसंत, आया बसंत/यशपाल सिंह


आया बसंत, आया बसंत
रस माधुरी लाया बसंत
आमों में बौर लाया बसंत
कोयल का गान लाया बसंत
आया बसंत आया बसंत

टेसू के फूल लाया बसंत
मन में प्रेम जगाता बसंत
कोंपले फूटने लगी
राग-रंग ले आया बसंत
आया बसंत आया बसंत

नव प्रेम के इज़हार का
मौसम ले आया बसंत
बसंती बयार में
झूमने लगे तन-मन
सोये हुए प्रेम को आके जगाया बसंत
आया बसंत आया बसंत

.....................यशपाल सिंह

इन्तज़ार


पौ फटते ही
उठ जाती हैं स्त्रियाँ
बुहारती हैं झाड़ू
और फिर पानी के
बर्तनों की खनकती
हैं आवाज़ें

पायल की झंकार और
चूड़ियों की खनक से
गूँज जाता है गली-मुहल्ले
का नुक्कड़
जहाँ करती हैं स्त्रियाँ
इंतज़ार कतारबद्ध हो
पाने के आने का।

होती हैं चिंता पति के
ऑफिस जाने की और
बच्चों के लंच बाक्स
तैयार करने की,

देखते ही देखते
हो जाती है दोपहर
अब स्त्री को इंतज़ार
होता है बच्चों के
स्कूल से लौटने का

और फिर धीरे-धीरे
ढल जाती है शाम भी
उसके माथे की बिंदी
अब चमकने लगती है
पति के इंतज़ार में

और फिर होता
उसे पौ फटने का
अगला इंतज़ार!!

अंजना बक्शी

वाह रे भारत महान‍ / पंकज चौधरी


खाने-खेलने की उम्र में
कूडे़ के ढेर पर
पोलीथिन बीनते बच्चे
अपने देश के नहीं
जैसे जापान के बच्चे हैं

और उनकी धँसी हुई आँखें
पांजर में सटा हुआ पेट
और जिस्म पर दिखती हड्डियों की रेखाएँ?

अपने देश की नहीं
बल्कि सोमालिया की हैं
और उनकी अर्जित की हुई संपत्ति?

अपने देश भारत की है
वाह-वाह रे हमारा भारत महान!

मंगलवार, 14 जून 2011


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बंद होंठों में छुपा लो



बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हैं हवा के पास
अनगिन आरियाँ
कटखने तूफान की
तैयारियाँ
कर न देना आँधियों को
रोकने की भूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हर नदी पर
अब प्रलय के खेल हैं
हर लहर के ढंग भी
बेमेल हैं
फेंक मत देना नदी पर
निज व्यथा की धूल
वर्ना रो पड़ोगे।

बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।*****